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रविवार, 9 दिसंबर 2012

स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1




स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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तुम्हे मेरी कसम - नीता पोरवाल (कविता : अंक-1)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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कविता-नीता पोरवाल

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तुम्हे मेरी कसम.....

झम्म से 
बरस जाती हो ...
न बरसा करो ...
तुम्हे मेरी कसम 

मेरी अपनी ही पंखुरियां 
मुझसे अलग हो 
कर जाती हैं 
अकेला रहने को 
विवश मुझे 

माना कि 
हो तप्त ....
देखता हूँ 
तुम्हारी राह..एकटक ......
गिना करता हूँ 
एक - एक पल 
तुम्हारी आमद का ........

पर सच कहता हूँ 
नहीं उत्कंठा 
तुम्हारे असीमित 
वेगमय प्रवाह की

पर्याप्त हैं कुछ बूँदें 
हाँ कुछ बूँदें 
मुझमे मेरे होने के 
अहसास के लिए 
क्यूकि तुम्हारे बिन 
मै "मै" कहाँ 

सो 
ऐ बाबरी 
नेह भरी बदरिया 
बरसा तो करो .....
पर तनिक....
आहिस्ते से 
तुम्हे मेरी कसम !!

ग़ज़ल - देवी नागरानी (अंक-1)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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दो ग़ज़ल – देवी नागरानी
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गजलः 1

रेत पर तुम बनाके घर देखो
कैसे ले जायेगी लहर देखो.

सारी दुनिया ही अपनी दुशमन है
कैसे होगी गुज़र-बसर देखो.

शब की तारीकियां उरूज़ पे हैं
कैसे होती है अब सहर देखो.

खामुशी क्या है तुम समझ लोगे
पत्थरों से भी बात कर देखो.

वो मेरे सामने से गुज़रे हैं
मुझसे हों जैसे बेख़बर देखो.

रूह आज़ाद फिर भी क़ैद रहे
तन में भटके हैं दर- बदर देखो.

सोच की शम्अ बुझ गईदेवी
दिल की दुनियां में डूबकर देखो.

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गजलः 2

मेरा वजूद टूटके बिखरा यहीं कहीं
मेरी नज़र से ढूँढ लो होगा यहीं कहीं

वीरान दिल की बस्तियाँ आबाद थी कभी
ख़ुशबू का सिलसिला कभी महका यहीं कहीं

फूलों की सुहबतों ने यूँ आदत बिगाड़ दी
भूली मैं कैसे ख़ार भी चुभा था यहीं कहीं

जब भी मिली हैं मँजिलें मेरे वजूद से
राहों में मेरा क़ाफ़िला छूटा यहीं कहीं

खुशियों की ख़ाहिशें सभी सीने में क़ैद है
अफ़सोस ग़म भी पास मिलेगा यहीं कहीं

बेदर्द वक़्त की चलीँ कुछ ऐसी आँधियाँ
देवीहमारा आशियाँ बिखरा यहीं कहीं

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Devi Nangrani,
9-D, Corner View Society,
15/33 Road, Bandra,
Mumbai 400050

जुलाहे बता एक बार - सी० एस० राजहंस (कविता : अंक-1)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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कविता-सी० एस० राजहंस

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जुलाहे बता एक बार..
 

जुलाहे
बता एक बार..

सहमे नाजुक धागों को
कैसे मना लेता है तू..
आड़े खड़े कसमसाते
कुलबुलाते धागों को,
एक कसावट में
बुने जाने को??

क्या
वो तुझसे डरते हैं,
नहीं......
तो फिर
क्या तुम उन्हें प्यार से
मनाते हो,
गीत गा कर..
दुलारते हो?

और जो कभी टूटता कोई धागा,
चतुर गांठें आ जाती,
झट पट,
कैसी कैसी तरकीब लगाता तू,

उलझते जंजाल से
बचता हुआ
कैसे बनाता जाता तू,
वो जो
ढांक लेता
इज्ज़त और सनक, सबकी,
आबरू और जिद भी,
और ठाठ भी..
दुल्हनिया क़ी आस भी..

जुलाहे,
बता मुझे भी,

बीती रात मेरे आँगन का
आसमान भी फटा है..
मुझे भी सिलना है,
रंग बिरंगे धागों से,
सुना है,
अबकी खूब बरसेगा आसमान.