स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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दो ग़ज़ल – देवी नागरानी
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गजलः 1
रेत पर तुम बनाके घर देखो
कैसे ले जायेगी लहर देखो.
सारी दुनिया ही अपनी दुशमन है
कैसे होगी गुज़र-बसर देखो.
शब की तारीकियां उरूज़ पे हैं
कैसे होती है अब सहर देखो.
खामुशी क्या है तुम समझ लोगे
पत्थरों से भी बात कर देखो.
वो मेरे सामने से गुज़रे हैं
मुझसे हों जैसे बेख़बर देखो.
रूह आज़ाद फिर भी क़ैद रहे
तन में भटके हैं दर- बदर देखो.
तन में भटके हैं दर- बदर देखो.
सोच की शम्अ बुझ गई ‘देवी’
दिल की दुनियां में डूबकर देखो.
दिल की दुनियां में डूबकर देखो.
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गजलः 2
मेरा वजूद टूटके बिखरा यहीं कहीं
मेरी नज़र से ढूँढ लो होगा यहीं कहीं
वीरान दिल की बस्तियाँ आबाद थी कभी
ख़ुशबू का सिलसिला कभी महका यहीं कहीं
ख़ुशबू का सिलसिला कभी महका यहीं कहीं
फूलों की सुहबतों
ने यूँ आदत बिगाड़ दी
भूली मैं कैसे ख़ार भी चुभा था यहीं कहीं
भूली मैं कैसे ख़ार भी चुभा था यहीं कहीं
जब भी मिली हैं मँजिलें मेरे वजूद से
राहों में मेरा क़ाफ़िला छूटा यहीं कहीं
राहों में मेरा क़ाफ़िला छूटा यहीं कहीं
खुशियों की ख़ाहिशें सभी सीने में क़ैद है
अफ़सोस ग़म भी पास मिलेगा यहीं कहीं
अफ़सोस ग़म भी पास मिलेगा यहीं कहीं
बेदर्द वक़्त की चलीँ कुछ ऐसी आँधियाँ
‘देवी’ हमारा आशियाँ बिखरा यहीं कहीं
‘देवी’ हमारा आशियाँ बिखरा यहीं कहीं
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Devi Nangrani,
9-D, Corner View Society,
15/33
Road, Bandra,
Mumbai
400050
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