स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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कविता-सी० एस० राजहंस
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जुलाहे बता एक बार..
जुलाहे
बता एक बार..
सहमे नाजुक धागों को
कैसे मना लेता है तू..
आड़े खड़े कसमसाते
कुलबुलाते धागों को,
एक कसावट में
बुने जाने को??
क्या
वो तुझसे डरते हैं,
नहीं......
तो फिर
क्या तुम उन्हें प्यार से
मनाते हो,
गीत गा कर..
दुलारते हो?
और जो कभी टूटता कोई धागा,
चतुर गांठें आ जाती,
झट पट,
कैसी कैसी तरकीब लगाता तू,
उलझते जंजाल से
बचता हुआ
कैसे बनाता जाता तू,
वो जो
ढांक लेता
इज्ज़त और सनक, सबकी,
आबरू और जिद भी,
और ठाठ भी..
दुल्हनिया क़ी आस भी..
जुलाहे,
बता मुझे भी,
बीती रात मेरे आँगन का
आसमान भी फटा है..
मुझे भी सिलना है,
रंग बिरंगे धागों से,
सुना है,
अबकी खूब बरसेगा आसमान.
बता एक बार..
सहमे नाजुक धागों को
कैसे मना लेता है तू..
आड़े खड़े कसमसाते
कुलबुलाते धागों को,
एक कसावट में
बुने जाने को??
क्या
वो तुझसे डरते हैं,
नहीं......
तो फिर
क्या तुम उन्हें प्यार से
मनाते हो,
गीत गा कर..
दुलारते हो?
और जो कभी टूटता कोई धागा,
चतुर गांठें आ जाती,
झट पट,
कैसी कैसी तरकीब लगाता तू,
उलझते जंजाल से
बचता हुआ
कैसे बनाता जाता तू,
वो जो
ढांक लेता
इज्ज़त और सनक, सबकी,
आबरू और जिद भी,
और ठाठ भी..
दुल्हनिया क़ी आस भी..
जुलाहे,
बता मुझे भी,
बीती रात मेरे आँगन का
आसमान भी फटा है..
मुझे भी सिलना है,
रंग बिरंगे धागों से,
सुना है,
अबकी खूब बरसेगा आसमान.
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