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रविवार, 6 जनवरी 2013

दो कविताएँ - सुनील शर्मा 'व्याकुल' (कविता : अंक-2)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण अंक-2
6 जनवरी 2013
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कविता – सुनील शर्मा ‘व्याकुल’

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१.
क्यों अकेला होता है चाँद
फलक पर,
अभिशप्त
घसीटने को एक बोझिल अकेलापन
क्या सज़ा है ये उसकी 
चाँद होना
या गलती खुदा की, कि
उसने दूसरा चाँद नहीं बनाया|


२.
फुटपाथ से दिखता होगा चाँद
रोटी के जैसा
या
महबूब सा
किसी बगीचे से
मगर एक और भी 
होता है चाँद
जो दीखता है
केवल
ऊँची इमारत की आलीशान खिड़की से
नितांत अकेला
भटकता
सफलता की कन्दराओं में
रोता अपने नसीब पर

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सुनील शर्मा “व्याकुल “
एम.ए.- जन-संचार
संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र
महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालय, वर्धा

क्या सच मे किसी को फर्क पड़ता है....?? - शिवम् मिश्रा (कविता : अंक-2)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण अंक-2
6 जनवरी 2013
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कविता - शिवम मिश्रा

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क्या सच मे किसी को फर्क पड़ता है....??

"कल तक सबको 'उस' के दर्द का अहसास था;
आज सब को अपनी अपनी जीत का अभिमान है!!
कल जहां रेप पीड़ितों की सूची थी...
उन्ही मेजों पर आज नए विधायकों की सूची तैयार है!!
किसी चैनल, किसी सभा मे 'उसके' बारे मे कोई सवाल नहीं है;
बहुतों के तन पर नई नई खादी सजी है
तभी तो सफदरजंग के आगे पटाखों की लड़ी जली है... 
बेगैरत शोर को अब किसी का ख्याल नहीं है!!
जो लोग रोज़ लोकतन्त्र को नंगा करते हो... 
उनको एक महिला की इज्ज़त जाने का अब मलाल नहीं है!
'तुम' जियो या मारो... 
किस को फर्क पड़ता है... 
आओ देख लो अब यहाँ कोई शर्मसार नहीं है!!
दरअसल 'तुम्हारी' ही स्कर्ट ऊंची थी... 
'इस' में 'इनका' कोई दोष नहीं...
"जवान लड़की को सड़क पर छोड़ा... 
क्या घरवालों को होश नहीं"
"लड़का तो 'वो' भोला था... 
यह सब चाउमीन की गलती है... 
वैसे एक बात बताओ लड़की घर से क्यों निकलती है??"
चलो जो हुआ सो हुआ उसको भूलो...
भत्ते... नौकरी सब तैयार है...
बस 'तुम' मुंह मत खोलो...
तुम्हारी चीख से मुश्किल मे पड़ती सरकार है...
अगली जीत-हार के लिए इनको तुम्हारी दरकार है...
गुजरात-हिमाचल से निबट लिए ...
अब दिल्ली की बारी है...
चुनावी वादा ही सही पर यकीन जानना...
दोषियों को छोड़ा न जाएगा यह मानना...
हम सब तुम्हारे साथ है डरना मत...
पर बिटिया अंधेरे के बाद घर से निकलना मत...
अंधेरा होते ही सब समीकरण बदल जाते है...
न जाने कैसे...
हमारे यह रक्षक ही सब से बड़े भक्षक बन जाते है...
कभी कभी लगता है यह वो मानवता के वो दल्ले है...
जिन्होने हर चलती बस-कार में...
खुद अपनी माँ, बहन, बीवी और बेटी...
नीलाम कर रखी है!! 

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शिवम् मिश्रा
मैनपुरी, उत्तर प्रदेश

रविवार, 9 दिसंबर 2012

तुम्हे मेरी कसम - नीता पोरवाल (कविता : अंक-1)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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कविता-नीता पोरवाल

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तुम्हे मेरी कसम.....

झम्म से 
बरस जाती हो ...
न बरसा करो ...
तुम्हे मेरी कसम 

मेरी अपनी ही पंखुरियां 
मुझसे अलग हो 
कर जाती हैं 
अकेला रहने को 
विवश मुझे 

माना कि 
हो तप्त ....
देखता हूँ 
तुम्हारी राह..एकटक ......
गिना करता हूँ 
एक - एक पल 
तुम्हारी आमद का ........

पर सच कहता हूँ 
नहीं उत्कंठा 
तुम्हारे असीमित 
वेगमय प्रवाह की

पर्याप्त हैं कुछ बूँदें 
हाँ कुछ बूँदें 
मुझमे मेरे होने के 
अहसास के लिए 
क्यूकि तुम्हारे बिन 
मै "मै" कहाँ 

सो 
ऐ बाबरी 
नेह भरी बदरिया 
बरसा तो करो .....
पर तनिक....
आहिस्ते से 
तुम्हे मेरी कसम !!

जुलाहे बता एक बार - सी० एस० राजहंस (कविता : अंक-1)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण – अंक-1
9 दिसंबर 2012
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कविता-सी० एस० राजहंस

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जुलाहे बता एक बार..
 

जुलाहे
बता एक बार..

सहमे नाजुक धागों को
कैसे मना लेता है तू..
आड़े खड़े कसमसाते
कुलबुलाते धागों को,
एक कसावट में
बुने जाने को??

क्या
वो तुझसे डरते हैं,
नहीं......
तो फिर
क्या तुम उन्हें प्यार से
मनाते हो,
गीत गा कर..
दुलारते हो?

और जो कभी टूटता कोई धागा,
चतुर गांठें आ जाती,
झट पट,
कैसी कैसी तरकीब लगाता तू,

उलझते जंजाल से
बचता हुआ
कैसे बनाता जाता तू,
वो जो
ढांक लेता
इज्ज़त और सनक, सबकी,
आबरू और जिद भी,
और ठाठ भी..
दुल्हनिया क़ी आस भी..

जुलाहे,
बता मुझे भी,

बीती रात मेरे आँगन का
आसमान भी फटा है..
मुझे भी सिलना है,
रंग बिरंगे धागों से,
सुना है,
अबकी खूब बरसेगा आसमान.