रविवार, 6 जनवरी 2013

दो कविताएँ - सुनील शर्मा 'व्याकुल' (कविता : अंक-2)



स्पंदन (online) ब्लॉग संस्करण अंक-2
6 जनवरी 2013
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कविता – सुनील शर्मा ‘व्याकुल’

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१.
क्यों अकेला होता है चाँद
फलक पर,
अभिशप्त
घसीटने को एक बोझिल अकेलापन
क्या सज़ा है ये उसकी 
चाँद होना
या गलती खुदा की, कि
उसने दूसरा चाँद नहीं बनाया|


२.
फुटपाथ से दिखता होगा चाँद
रोटी के जैसा
या
महबूब सा
किसी बगीचे से
मगर एक और भी 
होता है चाँद
जो दीखता है
केवल
ऊँची इमारत की आलीशान खिड़की से
नितांत अकेला
भटकता
सफलता की कन्दराओं में
रोता अपने नसीब पर

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सुनील शर्मा “व्याकुल “
एम.ए.- जन-संचार
संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र
महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालय, वर्धा

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