9 दिसंबर 2012
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कविता-
बृजेन्द्र श्रीवास्तव ‘उत्कर्ष’
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मैं भी कवि
बनना चाहूँ,
मगर लिखूं तो
क्या लिखूं..?
राम, श्याम,
गौतम, नानक,
औ ईसा,कबीर,
कुरान लिखूं.
जाति-धर्म-भाषा
औ क्षेत्र में,
बंटता
हिन्दुस्तान लिखूं.
कलुषित
हैवानों की संकीर्णता से,
धरती लहूलुहान
लिखूं या.
सत्य,अहिंसा
और प्रेम का,
मरता वह इंसान
लिखूं.
भ्रष्ट,
नपुंसक, कुर्सी के दलालों का,
झूठा यशगान
लिखूं या,
कायरता,
लोलुपता औ अन्धानुकरण से,
भारतीयता का
होता अपमान लिखूं.
भूखे, चीथड़े
में, खुले गगन वालों का,
रोटी, कपडा और
मकान लिखूं.
या फांसी के
फंदे पर झूले,
गरीब, मजदूर,
किसान लिखूं.
कल्पना लोक की
परियों संग खेलूँ,
या यथार्थ का
गान लिखूं.
झूठ लिखूं या
सत्य लिखूं,
या फिर झूठा
सत्य लिखूं,
मगर लिखूं तो
क्या लिखूं...?
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बृजेन्द्र श्रीवास्तव ‘उत्कर्ष’
२०६ टाइप-२
आई०आई०टी०, कानपूर
Email-
kaviutkarsh@gmail.com
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